गुरुवार, 3 नवंबर 2011

घर और जाल


दोपहर वो नींद से उठती है और पिंजरों में बैठे सारे तोते उड़ा देती है. उसे न ग़म होता है न खुशी, क्यूंकि अभी उसे आज़ादी नहीं मिली थी, शायद मिले भी नहीं .. शातिर सैयाद और भोला शिकार.
वो खुद बैठ के शिकारी के साथ जाल बुन रही थी, उसे बनाते हुए उसने पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी!

तोतों को तब तक देखती रही जब तक वो बादलों में डूब ना गए. वो सफ़ेद झाग-से बादल और 
हरे हरे तोते. गेट खुला, कोई व्यक्ति अंदर आया..उस व्यक्ति के हावभाव अजनबियों से नहीं थे, दोनों ने मुस्कुराहटें बांटीं. वो बिना कुछ कहे रसोई गयी, कुछ बिस्कुट और चाय साथ लाई. व्यक्ति को अनदेखा कर वो बाग के फूल ताकती, कभी आकाश देखती.

टीवी खोला, एक फिल्म चल रही थी. नायिका खुदखुशी कर लेती है. खून और टूटे शीशों के बिम्ब लिए वो टीवी बंद कर सोने चले गयी.


बुधवार, 27 जुलाई 2011

शहर

उसका इस शहर में दम घुटता था. पेट के खातिर, जाने किस-किस देस जाना पड़ता है . .
अनार्थ मगर आत्मा बिल्कुल कमज़ोर नहीं थी. कुछ और बहुत दुनियादारी सीखी, आज तक का सफ़र बिना किसी के अहसान और दुआओं के काटा.
गांव से यूँ शहर आना सोचा न था, पर ज्यों ही वहाँ खाने के लाले पड़ने लगे . . इस दफ़ा बारिश की कमी ने जाने कितने चूल्हों को ठंडा कर दिया !
खैर, अब यहाँ ही खुशी ढूँढनी थी. थकी-हारी घर लौटती, खाना बनाती. और जब बिस्तर पर देह रखती. जाने क्या बोलने लगता. पूरा गांव आस-पास आ बैठता, वहां के रंग, मेले . . अनजान रिश्ते.
और तब वो सोना भूल अपनी खिड़की से झांकती, एक छोटी-सी मैली खिड़की-जिससे चाँद दिखता था, एक लंबी सी इमारत (बड़े लोगों के मकां), एक कचड़े का ढेर और आस-पास मंडराते कुत्ते .. जो जब-तब भोंकते ही रहते थे. खिड़की पे आकर वो एक लंबी-सी सांस लेती और उसकी आँखें भर आतीं. यहाँ सब कुछ होते हुए भी जीवन नहीं था, मगर उधर गांव में . . वहां रोटी-चटनी से बड़ा नहीं था खुशियों का मिलना. मुस्कुराते चहरे, लबलबाती खुशियाँ...

और यहाँ अपनी मोटी सधी आवाज़ में वो एक साज़ गाती थी. जिसमें उसके दुःख, लौट जाने की इच्छा, सावन, आँगन सब आ बरसते. उस गान को सुन कोई भी रो पड़े शायद, पर रात कुछ कहती नहीं तो सुनती भी नहीं.


रविवार, 12 जून 2011

चोखेर बाली

१२.०६.२०११

चोखेर बाली देखी,
बड़ी लज़ीज़ होती हैं इस तरह की दर्ज इतिहास में जहाँ औरत मर्दों को ठीक उसी एड़ी के तले रखती हैं जहाँ उसे समाज रखता आया है. यहाँ अफसाना सरकता रहता है और वहाँ सूरज उगता-सा प्रतीत होता है. बात दमन की नहीं है
कि अन्याय के बदले अन्याय दिया जावे, पर कहानियों मे ही सही . . या कहीं गिनी-चुनी जिंदा-मृत मिसालों में सही . . सालों दबे आक्रोश को इन ज़रियों से फूटने का मौका मिलता है. सिकुड़े माथे को कुछ करार मिलता है.

दिन निकलता है,
और एक सुराख के ज़रिये
अंधियारी कुटिया में घर कर लेता है.

आशाओं का परिंदा कभी नहीं
थकता .. वो निरंतर उड़ता रहता है.

सोमवार, 6 जून 2011

मुलाक़ात और अजनबी

देखो मुलाकातों के ढेर लगे हैं,
पर हम अजनबी हैं आज भी
और शायद आगे भी रहेंगे . . .

प्रिया और अरिहंत कुछ एक साल पहले मिले थे. छोटी सी पहचान थी, नंदिता के ज़रिये जो दोनों की दोस्त थी. दो-तीन मुलाकातों ने तो कोई असर न छोड़ा. मगर फिर कभी-कभी जब नंदिता बीच में दोनों को अकेला छोड़ जाती, तब कोई चारा न पा कर एक-दुसरे मे झांकना पड़ता. और इत्तेफाक़न दोनों बहुत जुदा थे शौक में, तरीकों में .. पर जाने क्यूँ दोनों कुछ न कुछ वजह पकड़ चुके थे अब !

जानते-जानते कभी-कभी दोनों को अहसास होता कि लो पूरी हुई गयी तहक़ीक़ात, जान लिया इसे पूरी तरह. पर कभी-कभार एक दुसरे के उन विचित्र पहलुओं को उघाड़ते जिसके लिए शायद सदियाँ बीत जायें पर ये परत दर परत का लिपटाव नहीं.

खैर, उस खोज में रोमांस था. उस अजनबी से अहसास ने उन्हें एक काम दे रखा था. दोनों आँखें गढ़ाए, दिल खोले बैठे रहते . . . हाँ, प्यार है, कब तक . . जब तक हम अजनबी हैं, रोज़ मिलने वाले अजनबी !



सोमवार, 23 मई 2011

ग्वालियर के भीतर

एक नए शहर को सांस में भरना कितना सुखद होता है.
उसका इतिहास, उसके रंग, बाज़ार .. लोग, मकान सब आप के नाम होने को उत्सुक रहते हैं. पाँव पड़ा है एक ऐसा ही नया शहर .. और मैं पूरी तरह तैयार हूँ इसे अपनी बाहों में भरने के लिए.  क्या है मेरे शहर में, कुछ मेरी नज़र से ..

यहाँ मकबरे, किले हैं - मज़बूत होते हुए भी नज़ाकत की चादर ओढ़े. सांझ ढले लोग इनके इर्द गिर्द फ़ालतू किस्सों में उलझे निकल जाते हैं. कभी कभी उपेक्षित महसूस करते हैं खुद को, मगर कुछ इन्हें हलके हाथो से सहला कर देखनेवाले भी आते हैं. हाँ हाँ, कुल मिला कर खुश हैं ये !

फिर और .. और है गर्मी, और नज़रों को सुहाता अमलतास. इसे देखते हुए मैं कभी नहीं थकती. वो भी मुझपे नज़रों गढ़ाए चकित होता है. मैं कौन सुन्दर हूँ, जो ये इतने अचरच छोड़ मुझे देख रही है. पर तुम नहीं जानते अमलतास, उस दिन तुम्हारे नाम से नावाकिफ सिर्फ तुम्हारे पीले गुच्छों को ताका था. तभी गुज़रते किसी मजदूर ने पूछने पर तुम्हारा नाम बतलाया. बस तब से इशक में गुल हो गए तुम्हारे !! 

बाकी और भी बहुत कुछ है, पर ये रात छोटी है . . और बेशर्म चीख के मुझे वक़्त बतलाती है ! 
विदा. 


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

चर्चा के दौरान .

कई दफ़ा चर्चा के दौरान . . मुद्दों की गर्माहट के चलते .. मेरे नाख़ून बढ़ने लगते हैं, दांत नुकीले हो मुंह के बाहर निकल आते हैं. विपक्षी विपक्षी नहीं रहता, वो उस वक़्त एक तलवार बन जाता है, जो आपकी बातों को बेरहमी से व कभी-कभी बेतुके ढंग से काट रहा है, आपको निरंतर मानसिक दुःख दे रहा है. मैदान आप से भी छोड़ा नहीं जाता, न ही उसकी आँखों में ऊब नज़र आती है. चर्चा चलती रहती है, आप जानवर में तब्दील हो जाते हैं. और उस मुंह को कभी माफ़ नहीं कर पाते . . रह रह कर उसकी हरकतों में आप पागलपन ढूँढने लगते हैं.


















पेंटिंग: Steve Hornung

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

87वां जन्मदिन



आज वाजपेयी जी का जन्मदिन (87वां) है! ख़ुशी है, सब के बोल सुनने को मिल जाते हैं - उनकी तबियत ऐसी है,उनके घर दौरा किया,आदि आदि. पर कभी उनके मुंह से कोई बात नहीं सुनी, बस लोकसभा इलेक्शन के दौरान पार्टी को उन्होंने शुभ कामनाएं दी थीं . . जो बस पल दो पल आई और चली गयी. ना चेहरा देखने को मिलता है, ना बोल; उनके लिए लोगों के दिल में जो प्यार और इज्ज़त है उसमे तिल भर का भी फर्क नहीं पड़ता. बल्कि शायद मौनी या साधू को लोग इसलिए मानते हैं कि वो बोलते कम हैं, कम ही नज़र आते हैं. तो तुम्हारे अनंत कद को नापना अब और मुश्किल हो गया :-)

पर एक बात गले नहीं उतरती, बीजेपी वाजपेयी के नाम के कब तक गान गाती रहेगी. वो नहीं बोलते . . .  पर ये - "उनके युग में कभी जिए" लोग बडबडाते रहते हैं. 'उनके बड़े करीबी थे' कह के आप ही खुश होते रहते हैं. एक इंसान अपनी बची उम्र नाप रहा है, उसे चैन से सांस लेने दो, गुमनामी का भी अपना मज़ा है, खासकर तब जब एक काल में आपने बहु शोहरत कमाई हो. उसमे इन कौवों की चीं-चें रास नहीं आती. अभी अभी भारत रत्न को लेकर बवाल मचा रहे हैं, अरे भले मानुसों तुम सत्ता में आओ, खुद ऐलान करदो इस खुशखबर का! कांग्रेस तो ये करने से रही उसको दिवंगत गांधीयों की रूहों की खातिर करने से फुर्सत मिले तब तो. और यूँ 'भारत रत्न' जैसी चीज़ मांगे से अगर मिले तो ना मिलना भला.

अपनी झुकी कमर को सीधा करो, और अपनी बेशर्म नज़रों को नीचा करो . . अपने काले इतिहास को दमकाने के खातिर धर्म व जात की गुत्थियों को जड़ से मिटा दो. हिंदुत्व के नाम पे खून या मंदिर ना ढ़हने दो. क्यूँ नाम लिया जाता है, वाजपेयी का आज भी, ये समझो! कि उस मनुष्य ने, देश के लिए दहाड़ा भी . . जब बाबरी काण्ड हुआ उसे आंसू भी आये . . जिसने संघ को, सत्ता और देशहित के आड़े नहीं आने दिया. वो सच्चा देश भक्त है, एक सफ़ेद रूह वाला नेता, जो शांत है मगर आज भी दिलों में सशक्त है . . जिसकी कविताएँ उसके व्यक्तित्व का दर्पण हैं.

वाजपेयी जी, आपको मेरा और सबका बहुत-बहुत प्यार, खुश रहें और स्वस्थ रहें.
जय हिंद !